मंगलवार, 30 नवंबर 2010

रास्ट्रीय अभयारण

जल , जंगल, और जमीन जब तक यह सुरक्षित है पृथ्वी पर मनुष्य है । आज के आधुनिक युग में लोगों का आकर्षण विज्ञानं की तरफ ज्यादा है । मनुष्य चाहता है सभी कुछ बैठे बैठे प्राप्त हो जाये , बटन दबाते ही सभी काम हो जाएँ । आज मशीनो को ही जीवन का उद्देश्य बना लिया है , कुछ हद तक मशीनो की  जरूरत है जहाँ पर इंसान की जरूरत नहीं है । आज छोटे छोटे कार्य जो इंसान कर सकता है या अभी तक करता आया है उसे करने दिया जाये । जैसे जैसे मनुष्य के लिए काम की कमी  होती जाएगी पृथ्वी का बंटाधार होता जायेगा ।आज पर्यावरण का जो भी विनाश हुआ है उसका कारण विज्ञानं है , ध्वनी,  वायु , जल व मृदा प्रदूषण जो  मशीन,मोटर,जहाज ,कीटनाशक आदि के द्वारा उत्पन्न होता है । बेरोजगार इंसान पेट भरने के लिए जंगलों को काटता , पर्यावरण का संतुलन करने वाले जीवो को मारकर उनकी खालों की तस्करी  करते हैं , जिससे कई जीवों का अस्तित्व ही मिट गया है तथा कुछ मिटने की कगार पर हैं समुद्री जीवों का अत्यधिक मात्रा में दोहन करने से समुद्री कचरा बड़ रहा है । हम बात कर रहे थे रास्ट्रीय पार्कों की जिनकी हालत ऐसी होती जा रही है जो आगे चलकर ख़त्म होने की कगार पर पहुच गए हैं
सरकार को चाहिए यदि देश व पृथ्वी को बचाना है तो विज्ञानं पर पानी की तरह पैसा बहाने के बजाये पर्यावरण को बहने से बचाए वर्ना आने वाली पीढियां कभी माफ़ नहीं करेंगी, यह विज्ञानं धरा का धरा रह जायेगा जब धरा ही नहीं रहेगी
अच्छा रहेगा यदि हम जंगल को न छेड़ें , हमारा मानना है यदि जंगलों व पार्कों से इंसान को बाहर निकाला जाये , उस क्षेत्र से प्राकृतिक दोहन बंद किया जाये , कटीले तारों की बाड़ लगाई जाये , घने जगलों में प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगे , सजा का सक्त प्रावधान बने , पानी की समुचित व्यवस्था की जाये , जानवरों को अपनी जिंदगी जीने का अधिकार मिले । जब इंसान को मारने पर उसे मौत की सजा मिलती है ( आदमखोर) कहा जाता है । तो उसे मारने पर वही सजा इंसान को भी मिलनी चाहिए । बहुत ही सोचनीय विषय है हम इस पृथ्वी पर कियूं हैं, हमारा क्या उद्देश्य , हमें जिन्दा रहने के लिए क्या चाहिए , क्या मशीनो से हम पेट भर सकते हैं , या तिजोरी में भरे कागज के टुकड़ों से । इसका उत्तर क्या हो सकता है

नाम मिट जाते हैं ,निशान मिट जाते  हैं
पीढियां भूल जाती हैं , युग बदल जाते  है
प्रकृति बदल जाती है , दिशाएं खो जाती हैं
स्वरुप बदल जाता है ,नवीनता आ जाती है , 
धन्यवाद
    


शनिवार, 28 अगस्त 2010

जमीन

किसान जो दुनिया के हर इंसान का पेट पालता है। जब उसकी जमीन ही नहीं रहेगी तो फसल कहाँ से होगी लोगों का पेट कैसे भरेगा। जिस तेजी से विश्व  की जनसँख्या बढती जा रही है लोगों की जरूरत भी बढती जा रही है।
विकास के प्रथम चरण में लाखों हेक्टर जंगलों को काट कर खेती के लायक जमीन तैयार की, पुरखों की खून पसीने की कमाई को सरकार मिनटों में चंद कागजों पर हस्ताक्षर करके अमीर उद्योगपतियों के हवाले कर रही है जबकि लाखो हेक्टर जमीन बंजर पड़ी है। 
सरकार कह रही है हम किसानो के परिवार के एक वयक्ति को  नौकरी देंगे या मुआवजा इससे  कितने दिन खायेंगे , बांकी परिवार के सदस्य को क्या देंगे, जिनके यहाँ नौकरी लायक कोई नहीं है या नाबालिग है उसको क्या देंगे, या इसके बाद आने वाली पीड़ी को भी नौकरी देंगें , जिन खेतों के सहारे कई पीड़ी गुजर गई क्या उसका कोई मोल नहीं जिन्हें जल ,जमीन, जंगल से प्रेम है जिनकी वजह से करोड़ों लोगों का पेट भरता है क्या उनका यही हश्र होना है।
समय को देखते हुए सरकार की मांग भी जायज है परन्तु उपजाऊ भूमि तथा पर्यावरण की कीमत पर नहीं, इससे देश में खाद्दान की कमी होगी तथा लाखों हरे भरे पेंड काटेंगे जिससे पर्यावरण, ग्लोबल वार्मिंग तथा प्रदूषण बढेगा , जिस कारण प्राकर्तिक आपदाएं आयेंगी जो मानवता के लिए विनाशकारी है।  चंद रूपये बनाने की जगह , यदि हरा भरा भारत बनाये तो बेहतर होगा । 
अन्न के भण्डार जब प्रचुर मात्रा में होगें, सभी का पेट भरा होगा, तभी लोग खुशहाल होंगे, नयी नयी तक्नालाजी से पेट नहीं भरेगा उतनी ही तकनीक की जरूरत है जिससे काम हो सके तथा पृथ्वी सुरक्षित रहे तभी हम सुरक्षित हैं।
जमीन लीजिये लकिन जरूरत को देखते हुए, जरूरत के हिसाब से न की एडवांस में लेकर डाल दिया जो की वर्षों तक पड़ी रहती है  किसी के काम  नहीं आती। अंततः किसी रसूख वाले के फार्म हाउस या फैक्ट्री बन जाती है आज कल तो बड़े बड़े आश्रम बनने लगें हैं । 



सोमवार, 21 जून 2010

कानपुर

कानपुर शायद दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर हो यहाँ की आवो हवा इतनी ख़राब हो चुकी है, की जीना मुस्किल गो गया  है। एक समस्या हो तो गिनाई जाये यहाँ तो समस्याओं का अम्बार लगा हुआ है, हवा जहरीली हो चुकी है,पाताल तक पानी प्रदूषित हो गया है। कुछ साल ऐसे ही रहा तो यहाँ की मिट्टी बीज बोने लायक नहीं रहेगी। जब किसी घने पेड़ों के झुण्ड के पास से गुजरते हैं तो ठंडक का अहसाश होता है, सुकून मिलता है, परन्तु वैसे हवा तक गर्म महशूस होती है, आँखों में जलन होती है, शुद्ध पानी तो वैसे ही ३०० फीट नीच जा चुका है।  कुछ साल बाद पीने को पानी मिलना मुश्किल लगता है, गंगा मैया ,जीवन दायिनी कानपुर आने के बाद गंदे नाले में तब्दील हो जाती हैं। पानी के प्रदूषित हो जाने से हजारों हेक्टर भूमि खेती लायक नहीं रही  जो भी सब्जी की फसल होती है। वह सब्जियां खाने लायक नहीं होती, उनमे हानिकारक तत्व अवशोषित होने  के कारण  कई प्रकार की बीमारी हो रहीं हैं।
कानपुर की सीवर व्येवस्था अंग्रेजों के ज़माने की है वेह ध्वस्थ हो चुकी है, पूरे शहर में गंदा सीवर का पानी नजर आता है। सड़के भी पुराने समय की बनी है कई कई बार बना चुके पर चौड़ी कभी नहीं हुई, जबकि आबादी ५ गुना हो गई। जाम की विकट समस्या, सबसे ज्यादा रोड एक्सीडेंट में रोज औसतन ५ दुर्घटनाएं होती हैं। बिजली की समस्या ?  टैक्स चुकाने में अव्वल नंबर पर आने वाला शहर, सबसे ज्यादा राजस्व चुकाने वाला शहर, इतना पिछड़ा क्यूँ ? बताने की जरूरत नहीं है कानपुर क्या था क्या हो गया, और क्या होगा।
यहाँ के नेता सिर्फ मू से बक चक करते है, शहर को कूड़ा बना दिया, खुद भी मिटेंगे दूसरों को भी मिटायेंगे  कसम खा रखी है विकाश नहीं विनाश की।

बुधवार, 9 जून 2010

जीवन

 जीवन बचाना है, पर्यावरण बचाना है, तो समय चक्र को अपनी गति से चलने दो।
संसार में जितने भी जीव-जंतु, वृक्ष-लताएँ  हैं उनकी उत्पति कैसे हुई ,कब हुई , कहाँ से हुई इन सब बातों का पता लगाना आसान नहीं है,और न ही पता लगाया जा सकता है। क्यूंकि हम सब इस दुनिया में बाद में आये  हैं और जो वास्तु विलुप्त हो चुकी है उसे कैसे खोजेंगे। क्या कोई अपने पूर्वजों , माँ -बाप  भाई- बहन  को खोज सकता है उन हजारों विलुप्त प्राणियों ,वनस्पतियों जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते वे देखने में कैसे होते होंगे । आज के आधुनिक युग में हम  पदार्थों का सिर्फ  विशलेषण कर सकते हैं,सटीक हम कुछ भी नहीं बता सकते। संसार में हर स्थूल व सूक्ष्म चीजों चाहे वह प्राणी हो या पदार्थ उसका परिवर्तन निश्चित है , तथा हर एक का समय भी निश्चित है। संसार में आने ,जाने , बनने, बिगड़ने का, कोई तो शक्ति है जहाँ मनुष्य नहीं पहुँच सका । क्या आप सोंच सकते हैं एक ही पृथ्वी पर रहने वाले जीवों का जन्म व मरण का समय अलग-अलग निश्चित है, जैसे कुत्ते  का जन्म ३ माह में, बकरी ६ माह, गाये व इंसान ९ माह, हांथी १८ महीने में जन्म लेता है।  उसी प्रकार मृत्यु का भी समय निश्चित है  और यदि समय से पहले  कोई चीज प्राप्त की जाये तो वह बिगड़ जाती है, कुम्हार जब मिटटी का बर्तन बनता है तो घूमते हुए चाक पर उस वस्तु का समय निश्चित होता है उसी के अनुसार कुलड़, मटकी, सुराही बनती है तथा इनके पकने का समय भी निश्चित होता है। यदि समय से पहले निकालेंगे तो आधा-अधूरा व काला पड़ जायेगा , समय के बाद निकालेंगे तो ज्यादा तप कर टेड़ा-मेंडा  हो जायेगा यही क्रिया जीव ,जंतु तथा मनुष्य पर भी लागू होती है। और जीवन के लिए अग्नि तत्व महत्वपूर्ण है यह अग्नि तत्व ही जीवात्मा है, जितना शक्तिशाली  यह तत्व होगा उतना ही अच्छा जीवन उत्पन्न होगा, और कुम्हार का घड़ा भी मजबूत होगा। जितना अच्छा सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर आयेगा हरियाली व समृद्ध बढेगी। सब कुछ यदि समय के अनुसार होना चाहिए,आज इंसान चीजों  के आगे आगे भाग रहा है, वह पहले ही सब कुछ पा लेना चाहता है। क्या आगे भागने से कोई चीज प्राप्त हो सकती है वह चीज तो तुम्हारे पीछे है, यदि वह तुम्हारे उपयोग की है तो लो नहीं तो छोड़ दो । ............... 

सोमवार, 7 जून 2010

पर्यावरण

पृथ्वी को बचाना है , जीवन को बचाना है , सभ्यता को बचाना है, सबसे महत्त्वपूर्ण  हवा व पानी को बचाना है तो हर इंसान एक वृक्ष अवश्य लगाये, क्यूंकि वृक्ष से जल- जीवन-जमीन है /