किसान जो दुनिया के हर इंसान का पेट पालता है। जब उसकी जमीन ही नहीं रहेगी तो फसल कहाँ से होगी लोगों का पेट कैसे भरेगा। जिस तेजी से विश्व की जनसँख्या बढती जा रही है लोगों की जरूरत भी बढती जा रही है।
विकास के प्रथम चरण में लाखों हेक्टर जंगलों को काट कर खेती के लायक जमीन तैयार की, पुरखों की खून पसीने की कमाई को सरकार मिनटों में चंद कागजों पर हस्ताक्षर करके अमीर उद्योगपतियों के हवाले कर रही है जबकि लाखो हेक्टर जमीन बंजर पड़ी है।
सरकार कह रही है हम किसानो के परिवार के एक वयक्ति को नौकरी देंगे या मुआवजा इससे कितने दिन खायेंगे , बांकी परिवार के सदस्य को क्या देंगे, जिनके यहाँ नौकरी लायक कोई नहीं है या नाबालिग है उसको क्या देंगे, या इसके बाद आने वाली पीड़ी को भी नौकरी देंगें , जिन खेतों के सहारे कई पीड़ी गुजर गई क्या उसका कोई मोल नहीं जिन्हें जल ,जमीन, जंगल से प्रेम है जिनकी वजह से करोड़ों लोगों का पेट भरता है क्या उनका यही हश्र होना है।
समय को देखते हुए सरकार की मांग भी जायज है परन्तु उपजाऊ भूमि तथा पर्यावरण की कीमत पर नहीं, इससे देश में खाद्दान की कमी होगी तथा लाखों हरे भरे पेंड काटेंगे जिससे पर्यावरण, ग्लोबल वार्मिंग तथा प्रदूषण बढेगा , जिस कारण प्राकर्तिक आपदाएं आयेंगी जो मानवता के लिए विनाशकारी है। चंद रूपये बनाने की जगह , यदि हरा भरा भारत बनाये तो बेहतर होगा ।
अन्न के भण्डार जब प्रचुर मात्रा में होगें, सभी का पेट भरा होगा, तभी लोग खुशहाल होंगे, नयी नयी तक्नालाजी से पेट नहीं भरेगा उतनी ही तकनीक की जरूरत है जिससे काम हो सके तथा पृथ्वी सुरक्षित रहे तभी हम सुरक्षित हैं।
जमीन लीजिये लकिन जरूरत को देखते हुए, जरूरत के हिसाब से न की एडवांस में लेकर डाल दिया जो की वर्षों तक पड़ी रहती है किसी के काम नहीं आती। अंततः किसी रसूख वाले के फार्म हाउस या फैक्ट्री बन जाती है आज कल तो बड़े बड़े आश्रम बनने लगें हैं ।
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